मंगलवार, 11 जुलाई 2017

वक़्त की पाबंदी का अभ्यास ज़रूरी है



ब्रह्ममुहूर्त
रात्रि का चौथा प्रहर
सूर्योदय से पूर्व का समय
अमृत बेला
सौंदर्य,बल,विद्या,बुद्धि,स्वास्थ्य के लिए
अति उत्तम समय  ...

ब्रह्म अर्थात परमात्मा
वह शक्ति
जो हमें हमारा परिचय देती है
हमारे होने का उद्देश्य बतलाती है
आसुरी विचारों से बचाती है
हवायें संजीवनी बन बहती है
माँ सरस्वती ज्ञान के मंत्र बोलती हैं
पंछियों का मधुर कलरव
मन मस्तिष्क को
जाग्रत करता है
...
सत्य ब्रह्ममुहूर्त में ही
सूर्य की लालिमा लिए
उदित होता है
वेद अपना अस्तित्व बताते हैं
प्रकृति इतनी शांत होती है
कि निःशब्द
ध्वनि प्रतिध्वनि को
हम सुन सकते हैं
आत्मसात कर सकते हैं
...
तो क्यों दुनिया रात भर भाग रही है
इस पर गौर मत करना
समय से खाना
समय से सोना
और समय से
मतलब
ब्रह्ममुहूर्त में उठना !
सूरज तुमसे पहले आ जाए
तो तुम उसका स्वागत कैसे करोगे ?
चिड़िया की पहली चीं चीं
भला कैसे सुनोगे ?
ज़िन्दगी को अर्थ देने के लिए
यह सबक ज़रूरी है
कुछ भी करने के लिए
वक़्त की पाबंदी का
अभ्यास ज़रूरी है
लक्ष्य को पाने के लिए
नियम में बंधना ज़रूरी है  ...

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

आओ पढ़े अ आ इ ई



ये है 'अ' 
अ अ अ 
अ से होता है अनार 
लाल लाल दाने 
मीठे मीठे दाने 
सुबह सुबह खाओ 
स्वस्थ हो जाओ  ... 

आ से आम 
आ आ आ 
मीठे मीठे आम 
गर्मी के मौसम का 
राजा है ये आम 
गुट गुट खाओ 
रसीले हो जाओ  ... 


इ से इमली 
खट्टी मीठी इमली 
सेहत बनाये 
भूख बढाए 
खा लो बनाके 
इमली की चटनी  ... 

ई से ईख 
ईख से बनती है चीनी 
और बनता है गुड़ 
ईख खाओ 
या शरबत पीयो 
पाओगे विटामिन बी और सी  ... 

उ से देखो ये उड़नखटोला 
तुमको घुमायेगा ये उड़नखटोला 
धरती से आकाश तक उड़ेगा 
हाँ हाँ तुम्हारा ये उड़नखटोला  ... 

ऊ ऊ ऊ 
ऊ से आया ऊन 
अम्मा बनाएगी स्वेटर 
सर्दी को दूर भगाएगी 
ऊ ऊ ऊ 
ऊ ऊ ऊ  ... 

ए से एक 
हम बनेंगे एक 
आवाज़ दो हम एक हैं  ... 

ऐ से ये है ऐनक 
आँखों की रौशनी हो कम 
तो काम आए ऐनक  ... 

ओ से देखो ओस की बूँदें 
दूब पे ठिठकी ओस 
ओ ओ ओ  ... 

औ से औरत 
माँ है औरत 
औरत देती जीवन  ... 

अं अं अं 
अं से अंगूर 
खट्टे भी और मीठे भी  ... 

अः अः अः 

शनिवार, 1 जुलाई 2017

एक कवच




कुनू अमू 
ये है अम्मा की ख्वाहिश, उनकी बताई सीख,
जो एक कवच ही है 
आओ, पहनो इसे दृढ़ता के साथ 

तुम्हारे लिए....


सपने देखो तो ज़रूर
समझो सपनों की भाषा
निश्चित तुमको मिलेगी मंजिल
पूरी होगी आशा !
सपने साथ में हैं गर तेरे
तू मजबूर नहीं है
तूफानों से मत घबराना
मंजिल दूर नहीं है !
बड़े पते की बात है प्यारे
घबराकर मत रोना
आग में तपकर ही जो निखरे
है वही सच्चा सोना !
बुरा नहीं होता है प्यारे
आंखों का सपनाना
सपने सच भी होते हैं
यह मैंने भी है जाना !
सपने ही थे साथ सफर में
और तेरा हमसाया
कतरे की अब बात भुला दे
दरिया सामने आया !
नहीं असंभव बात ये कोई
फिर हो नई कहानी
तुम बन जाओ एक और
धीरू भाई अम्बानी !

सरस्वती प्रसाद (अम्मा)

गुरुवार, 22 जून 2017

कल्पना करो




कल्पना करो
....
देश की बागडोर
एक दिन तुम्हारे हाथ में होगी
सूरज तुम्हारी मुट्ठी में होगा
तब यह सूरज
कहाँ कहाँ रखोगे ?
जब अधिक झुलसाए उसकी आग
तो बादल को कैसे बुलाओगे
सम स्थिति पर
धरती को कैसे रखोगे !

शांत मन से
कल्पना करो
मानो
हर कदम में एक जादू है
बस उसे बढ़ाने की देर है
कुछ ठोकरों के कमाल होंगे
फिर तुम दृढ होंगे

प्रकृति ने जो कुछ हमें दिया है
वह हमारी आत्मशक्ति बढ़ाने का
उत्कृष्ट माध्यम है
सूरज
चाँद
बादल
हवा
रिमझिम बारिश
नदी-नाले
पर्वत-रेगिस्तान
कंकड़, रेत
हर छोर में ज्ञान है
एकांत में अपनी प्रतिध्वनि सुनो
तुम्हारी हर कल्पना में
गुरु मिलेंगे
जीवन का विस्तृत क्षेत्र
तुम्हारे लिए गुरुकुल होगा
दूब से लेकर शून्य तक
कल्पना करते जाओ
यही बहुत है
सबकुछ है
:)

मंगलवार, 6 जून 2017

नन्हे पैरों के नाम.......




अम्मा की विरासत है यह नन्हें पैरों के नाम
......
हम प्रायः यही सोचते हैं कि वसीयत होती है आर्थिक सम्पत्ति की
हम नहीं समझते समय रहते कि इस सम्पत्ति से हमारे बीच दीवारें खड़ी होती हैं
हम हिंसक प्रवृति के हो जाते हैं
लेकिन शब्दों की थाती
वह भी वो
जो लिख दी गई हो
बाँटी नहीं जा सकती
अपनी मर्ज़ी से
वह अपने साथ होती है
जैसे अम्मा की सौगात मैं अपनी मर्ज़ी से तुमदोनों को दे रही हूँ
इसे गुनगुनाना
इसे संभालना
तुमदोनों की मर्ज़ी  ...
यह किसी एक के लिए नहीं,
सभी नन्हें पैरों के नाम है



( १ )

हम हैं मोर,हम हैं मोर
कूदेंगे , इतरायेंगे -
पंखों का साज बजायेंगे,
आपका मन बहलाएँगे ।
हम है मोर,हम हैं मोर
नभ में बादल छाएंगे,
हम छम-छम नाच दिखायेंगे
आपको नाच सिखायेंगे ।
हम हैं गीत,हम हैं गीत
दरिया के पानी का
मौसम की रवानी का
आपको गाना सिखायेंगे ।
हम हैं धूप,हम हैं छांव
आगे बढ़ते जायेंगे
कभी नहीं घबराएंगे
आपको जीना सिखायेंगे ।


( २ )

मैं हूँ एक परी
और मेरा प्यारा नाम है गुल
गर चाहूँ तो तुंरत बना दूँ
शूल को भी मैं फूल !
चाहूँ तो पल में बिखेर दूँ
हीरे,मोती ,सोना
पर इनको संजोने में तुम
अपना समय न खोना !
अपना ' स्व ' सबकुछ होता है
' स्व' की रक्षा करना
प्यार ही जीवन-मूलमंत्र है
प्यार सभी को करना !


( ३ )

मैं हूँ रंग-बिरंगी तितली
सुनिए आप कहानी,
मैं हूँ सुंदर,मैं हूँ कोमल
मैं हूँ बड़ी सयानी
इधर-उधर मैं उड़ती - फिरती ,
करती हूँ मनमानी ! मैं हूँ.................
फूलों का रस पीती हूँ
मस्ती में मैं जीती हूँ
रस पीकर उड़ जाती हूँ
हाथ नहीं मैं आती हूँ !
मैं हूँ रंग-बिरंगी तितली........


( ४ )

बिल्ली मौसी,बिल्ली मौसी
कहो कहाँ से आती हो
घर-घर जाकर चुपके-चुपके
कितना माल उडाती हो ।
नहीं सोचना तुम्हे देखकर
मैं तुमसे डर जाती हूँ
म्याऊं- म्याऊं सुनकर तेरी
अन्दर से घबराती हूँ !
चाह यही है मेरी मौसी
जल्दी तुमसे कर लूँ मेल
फिर हमदोनों भाग-दौड़ कर
लुकाछिपी का करेंगे खेल !

 सरस्वती प्रसाद(अम्मा)

रविवार, 4 जून 2017

मंथन करना सीखो




सबसे बड़ा रुपैया नहीं होता बेटा 
सबसे बड़ा होता है आपस का प्यार 
ख्याल 
सम्मान .... 
बासी रोटी सुख-संतोष धन देती है 
जब जैसा मिले खाओ 
पहनो 
.... निःसंदेह,
पैसा तुम्हारे लिए कुछ भी उपस्थित कर सकता है 
पर उस लेने की भीड़ में 
तुम सिर्फ चीजों का ही आकलन करते रह जाओगे !
प्रकृति ने बिना मोल के 
क्या क्या दिया है 
तुम उसकी गहराई में नहीं उतर पाओगे !
जीने के लिए ज़रूरी है 
व्यक्तित्व का निर्माण 
जिसके लिए 
सत्य का मार्ग अपनाना होता है 
कर्ण की दानवीरता 
एकलव्य की निष्ठा 
अर्जुन का लक्ष्यभेद 
और कृष्ण का सारथि होना 
तुम्हें ज्ञान का 
अद्भुत मार्ग दिखाएंगे 
सुदामा की मित्रता 
मित्रता के सच्चे अर्थ देगी 
.... 
प्रकृति के कण कण में 
ईश्वर ने कई गीत,
और रंग भरे हैं 
सीखने के लिए 
उन सबके पास 
शांत,स्थिर मन के साथ 
बैठना होगा 
..... 
पैसा ज़रूरी है 
लेकिन 
हर परीक्षा पास करने के बाद !
ताकि 
तुम उसका उचित प्रयोग कर सको 
सिर्फ मॉल 
चकाचौंध की यात्रा 
डिस्को 
और इससे जुडी स्पर्धा की दौड़ 
तुम्हें बर्बाद करेगी 
दीमक की तरह 
... 
प्रायः गलत रास्ते आकर्षित करते हैं 
आकर्षण यदि तुम्हें अपनी ओर खींचे 
तो सोचो 
इससे क्या होगा !
मंथन करना सीखो,
मंथन से ही अलग होगा 
अमृत और विष !
.... 

सोमवार, 29 मई 2017

क्या ख्याल है ?




हम मिलते हैं
तो हमेशा के लिए साथ क्यूँ नहीं रहते ?
कभी कुनू चली जाती है
कभी अम्मू नानी
कभी अमू यानी हमारी जुनू  ...
हाँ
कुनू को छोड़कर
पहले अम्मू नानी गई
फिर कुनू आई और गई
अमू तो हर बार टाटा बाय बाय कर जाती है !
उसके बाद
फिर हम एक छोटे से मोबाइल में
एक दूसरे को पकड़ने की कोशिश करते हैं
... ये भी कोई बात है !
चलो एक मिश्री वाला महल बनाते हैं
थोड़ी थोड़ी मिश्री खाते हुए
छुप्पा छुप्पी खेलेंगे
मिठास पर सोयेंगे
मीठे मीठे सपने देखेंगे  ...

हमलोग साफ़ साफ़ पापा,मम्मा से विनती करेंगे
कि एक घर में नानी/दादी के साथ कुनू अमू को रख दिया जाए
और एक कामवाली बाई काम के लिए !

जहाँ हम, हमारे चंदा मामा होंगे
होगी मस्त मस्त सी मासूम परियाँ
चंदामामा की भी अम्मा होंगी
कुछ सितारे कुछ तितलियाँ
कुछ गिलहरियाँ
कुछ खरगोश  ...

कहो कुनू अमू
क्या ख्याल है ?

मंगलवार, 16 मई 2017

चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ,




चूहे की चूँ चूँ शान देखो 
बिल्ली मौसी नहीं है आस-पास 
तो कैसा मुखिया बना दे रहा हिदायतें ... 
लेकिन जैसे ही निकला बाहर 
सर पर रखकर पाँव 
आया घर के अंदर। 
घर के अंदर सब यूँ ही शेर बने रहते 
एक म्याऊँ के आते 
हो जाते रफूचक्कर  ... 

आज सुनो राष्ट्र कवि दिनकर की कविता चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ,



चूहे ने यह कहा कि चूहिया! छाता और घड़ी दो,
लाया था जो बड़े सेठ के घर से, वह पगड़ी दो।
मटर-मूँग जो कुछ घर में है, वही सभी मिल खाना,
खबरदार, तुम लोग कभी बिल से बाहर मत आना!
बिल्ली एक बड़ी पाजी है रहती घात लगाए,
जाने वह कब किसे दबोचे, किसको चट कर जाए।
सो जाना सब लोग लगाकर दरवाजे में किल्ली,
आज़ादी का जश्न देखने मैं जाता हूँ दिल्ली।
चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ,

दिल्ली में देखूँगा आज़ादी का नया जमाना,
लाल किले पर खूब तिरंगे झंडे का लहराना।
अब न रहे, अंग्रेज, देश पर अपना ही काबू है,
पहले जहाँ लाट साहब थे वहाँ आज बाबू है!
घूमूँगा दिन-रात, करूँगा बातें नहीं किसी से,
हाँ फुर्सत जो मिली, मिलूँगा जरा जवाहर जी से।
गाँधी युग में कैन उड़ाए, अब चूहों की खिल्ली?
आज़ादी का जश्न देखने मेैं जाता हूँ दिल्ली।
चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ,

पहन-ओढ़कर चूहा निकला चुहिया को समझाकर,
इधर-उधर आँखें दौड़ाईं बिल से बाहर आकर।
कोई कहीं नहीं था, चारों ओर दिशा थी सूनी,
शुभ साइत को देख हुई चूहे की हिम्तत दूनी।
चला अकड़कर, छड़ी लिये, छाते को सिर पर ताने,
मस्ती मन की बढ़ी, लगा चूँ-चूँ करके कुछ गाने!
इतने में लो पड़ी दिखाई कहीं दूर पर बिल्ली,
चूहेराम भगे पीछे को, दूर रह गई दिल्ली।
चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ,

सोमवार, 8 मई 2017

जादू ही जादू :)




मेरी कुनू , मेरी अमू

तब तो बना दे तू भोले को हाथी ....'
खेल से परे एक काल्पनिक काबुलीवाला
हींग टिंग झट बोल में बस गया ...
जब कोई नहीं होता था पास
तब
अपनी नन्हीं सी पोटली खोलती
काबुलीवाले को
मंतर पढके बाहर निकालती
और पिस्ता बादाम मेरी झोली में
सच्ची मेरी चाल बदल जाती !
फिर मेरे खेल में
मेरे सपनों का साथी बना अलीबाबा
और शून्य में देखती मैं 40 चोर
'खुल जा सिम सिम ' का गुरुमंत्र लेते
बन जाती अलीबाबा
और ..... कासिम सी दुनिया
रानी की तरह मुझे देख
रश्क करती !
कभी कभी आत्मा कहती -
यह चोरी का माल है
पर चोरों से इसे हासिल करना
बड़ी हिम्मत की बात है
आत्मा को यह गवाही देकर
निश्चिन्त हो जाती ...
पर कासिम !!!
पीछा करता
चोर मुझे ढूंढते ...
जब बचना मुश्किल लगता
तो शून्य से यथार्थ में लौट आती !

फिर फिल्मों में प्रभु का करिश्मा देखा
कड़ाही खुद चूल्हे पर
सब्जी कट कट कट कट कटकर
कड़ाही में ....
आटा जादू से गूँथ जाता
फिर लोइयां , फिर पुरियां
इतना अच्छा लगता
कि मैं रोज भगवान् को मिसरी देकर कहती
ऐसा समय आए तो ज़रा ध्यान रखना
और सोचती ...
ऐसा होगा तब सब मुझे ही काम देंगे
और मैं कमरे की सांकल लगा प्रभु के जादू से
बिना थके
सारे काम निबटाकर
मुस्कुराती बाहर निकलूंगी
सबकी हैरानी सोचकर
बड़ा मज़ा आता था ....

फिर आई लाल परी
और मैं बन गई सिंड्रेला
चमचमाते जूते
बग्घी ... और राजकुमार !
घड़ी की सुइयों पर रहता था ध्यान
१२ बजने से पहले लौटना है ...
मेरी जूती भी रह जाती सीढियों पर
फिर ...
राजकुमार का ऐलान
और मेरा पैर जूते में फिट !
....
इनसे अलग
ज़िन्दगी के असली रास्ते
बुद्ध की तरह नागवार थे
महाभिनिष्क्रमण मुमकिन न था
तो मुंगेरी लाल से सपने जोड़ लिए
पर एक बात है
मुंगेरी लाल की तरह मैं नहीं हुई
मेरे हर सपने मुझे जो बनाते थे
वे उतनी देर का सच होते थे
मेरे चेहरे पर होती थी मुस्कान
और भरोसा -
कि मैं कुछ भी कर सकती हूँ !
...
सपनों का घर इतना सुन्दर रहा ...
इतना सुन्दर है
इतना ------- कि ...
काँटों पर
सिर्फ फूल सा एहसास नहीं हुआ
बल्कि कांटे फूल बन जाते रहे
और मैं शहजादी ...
मुझे मिली मिस्टर इंडिया की घड़ी
जिसे पहन मैं गायब होकर मसीहा बन गई
मैं जिनी बनी , मैं जिन्न बनी
पूरी दुनिया की सैर की
सच कहूँ - करवाई भी ....
सबूत चाहिए ?
... हाहाहा , अब तकसब  मेरे साथ सैर ही तो कर रहे हो न ?


क्रम जारी है ...
जब भी मन ना लगे
आवाज़ देना
आजमाना अपने सपनों के इस सौदागर को
गुलमर्ग मेरी मुट्ठी में है
खिलनमर्ग मेरी बातों में
उड़नखटोला मेरी बाहों में
जादू ही जादू :)

बुधवार, 3 मई 2017

काबुलीवाला - रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी




कुनू अमू 

मैं जब छोटी थी तो हमेशा काबुलीवाले की मिन्नी बनती थी,
नाम भी मिन्नी 
घड़ी भर भी चुप नहीं रहती थी 
मुझे मेरे पापा टेपरिकॉर्डर कहते थे :)
बोलती थी तो बस रिवाइंड,प्ले चलता था 
तभी तो 
मेरे पास अपनी कहानी भी है 
और सुनाने को औरों की भी कहानी 
आज सुनो  रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी 


मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, "बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह 'काक' को 'कौआ' कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।" मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी। "देखो, बाबूजी, भोला कहता है - आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न?" और फिर वह खेल में लग गई।
मेरा घर सड़क के किनारे है। एक दिन मिनी मेरे कमरे में खेल रही थी। अचानक वह खेल छोड़कर खिड़की के पास दौड़ी गई और बड़े ज़ोर से चिल्लाने लगी, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!"
कँधे पर मेवों की झोली लटकाए, हाथ में अँगूर की पिटारी लिए एक लंबा सा काबुली धीमी चाल से सड़क पर जा रहा था। जैसे ही वह मकान की ओर आने लगा, मिनी जान लेकर भीतर भाग गई। उसे डर लगा कि कहीं वह उसे पकड़ न ले जाए। उसके मन में यह बात बैठ गई थी कि काबुलीवाले की झोली के अंदर तलाश करने पर उस जैसे और भी दो-चार बच्चे मिल सकते हैं।
काबुली ने मुसकराते हुए मुझे सलाम किया। मैंने उससे कुछ सौदा खरीदा। फिर वह बोला, "बाबू साहब, आप की लड़की कहाँ गई?"
मैंने मिनी के मन से डर दूर करने के लिए उसे बुलवा लिया। काबुली ने झोली से किशमिश और बादाम निकालकर मिनी को देना चाहा पर उसने कुछ न लिया। डरकर वह मेरे घुटनों से चिपट गई। काबुली से उसका पहला परिचय इस तरह हुआ। कुछ दिन बाद, किसी ज़रुरी काम से मैं बाहर जा रहा था। देखा कि मिनी काबुली से खूब बातें कर रही है और काबुली मुसकराता हुआ सुन रहा है। मिनी की झोली बादाम-किशमिश से भरी हुई थी। मैंने काबुली को अठन्नी देते हुए कहा, "इसे यह सब क्यों दे दिया? अब मत देना।" फिर मैं बाहर चला गया।
कुछ देर तक काबुली मिनी से बातें करता रहा। जाते समय वह अठन्नी मिनी की झोली में डालता गया। जब मैं घर लौटा तो देखा कि मिनी की माँ काबुली से अठन्नी लेने के कारण उस पर खूब गुस्सा हो रही है।
काबुली प्रतिदिन आता रहा। उसने किशमिश बादाम दे-देकर मिनी के छोटे से ह्रदय पर काफ़ी अधिकार जमा लिया था। दोनों में बहुत-बहुत बातें होतीं और वे खूब हँसते। रहमत काबुली को देखते ही मेरी लड़की हँसती हुई पूछती, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले! तुम्हारी झोली में क्या है?"
रहमत हँसता हुआ कहता, "हाथी।" फिर वह मिनी से कहता, "तुम ससुराल कब जाओगी?"
इस पर उलटे वह रहमत से पूछती, "तुम ससुराल कब जाओगे?"
रहमत अपना मोटा घूँसा तानकर कहता, "हम ससुर को मारेगा।" इस पर मिनी खूब हँसती।
हर साल सरदियों के अंत में काबुली अपने देश चला जाता। जाने से पहले वह सब लोगों से पैसा वसूल करने में लगा रहता। उसे घर-घर घूमना पड़ता, मगर फिर भी प्रतिदिन वह मिनी से एक बार मिल जाता।
एक दिन सवेरे मैं अपने कमरे में बैठा कुछ काम कर रहा था। ठीक उसी समय सड़क पर बड़े ज़ोर का शोर सुनाई दिया। देखा तो अपने उस रहमत को दो सिपाही बाँधे लिए जा रहे हैं। रहमत के कुर्ते पर खून के दाग हैं और सिपाही के हाथ में खून से सना हुआ छुरा।
कुछ सिपाही से और कुछ रहमत के मुँह से सुना कि हमारे पड़ोस में रहने वाले एक आदमी ने रहमत से एक चादर खरीदी। उसके कुछ रुपए उस पर बाकी थे, जिन्हें देने से उसने इनकार कर दिया था। बस, इसी पर दोनों में बात बढ़ गई, और काबुली ने उसे छुरा मार दिया।
इतने में "काबुलीवाले, काबुलीवाले", कहती हुई मिनी घर से निकल आई। रहमत का चेहरा क्षणभर के लिए खिल उठा। मिनी ने आते ही पूछा, ''तुम ससुराल जाओगे?" रहमत ने हँसकर कहा, "हाँ, वहीं तो जा रहा हूँ।"
रहमत को लगा कि मिनी उसके उत्तर से प्रसन्न नहीं हुई। तब उसने घूँसा दिखाकर कहा, "ससुर को मारता पर क्या करुँ, हाथ बँधे हुए हैं।"
छुरा चलाने के अपराध में रहमत को कई साल की सज़ा हो गई।
काबुली का ख्याल धीरे-धीरे मेरे मन से बिलकुल उतर गया और मिनी भी उसे भूल गई।
कई साल बीत गए।
आज मेरी मिनी का विवाह है। लोग आ-जा रहे हैं। मैं अपने कमरे में बैठा हुआ खर्च का हिसाब लिख रहा था। इतने में रहमत सलाम करके एक ओर खड़ा हो गया।
पहले तो मैं उसे पहचान ही न सका। उसके पास न तो झोली थी और न चेहरे पर पहले जैसी खुशी। अंत में उसकी ओर ध्यान से देखकर पहचाना कि यह तो रहमत है।
मैंने पूछा, "क्यों रहमत कब आए?"
"कल ही शाम को जेल से छूटा हूँ," उसने बताया।
मैंने उससे कहा, "आज हमारे घर में एक जरुरी काम है, मैं उसमें लगा हुआ हूँ। आज तुम जाओ, फिर आना।"
वह उदास होकर जाने लगा। दरवाजे़ के पास रुककर बोला, "ज़रा बच्ची को नहीं देख सकता?"
शायद उसे यही विश्वास था कि मिनी अब भी वैसी ही बच्ची बनी हुई है। वह अब भी पहले की तरह "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले" चिल्लाती हुई दौड़ी चली आएगी। उन दोनों की उस पुरानी हँसी और बातचीत में किसी तरह की रुकावट न होगी। मैंने कहा, "आज घर में बहुत काम है। आज उससे मिलना न हो सकेगा।"
वह कुछ उदास हो गया और सलाम करके दरवाज़े से बाहर निकल गया।
मैं सोच ही रहा था कि उसे वापस बुलाऊँ। इतने मे वह स्वयं ही लौट आया और बोला, "'यह थोड़ा सा मेवा बच्ची के लिए लाया था। उसको दे दीजिएगा।"
मैने उसे पैसे देने चाहे पर उसने कहा, 'आपकी बहुत मेहरबानी है बाबू साहब! पैसे रहने दीजिए।' फिर ज़रा ठहरकर बोला, "आपकी जैसी मेरी भी एक बेटी हैं। मैं उसकी याद कर-करके आपकी बच्ची के लिए थोड़ा-सा मेवा ले आया करता हूँ। मैं यहाँ सौदा बेचने नहीं आता।"
उसने अपने कुरते की जेब में हाथ डालकर एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकला औऱ बड़े जतन से उसकी चारों तह खोलकर दोनो हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया। देखा कि कागज के उस टुकड़े पर एक नन्हें से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप हैं। हाथ में थोड़ी-सी कालिख लगाकर, कागज़ पर उसी की छाप ले ली गई थी। अपनी बेटी इस याद को छाती से लगाकर, रहमत हर साल कलकत्ते के गली-कूचों में सौदा बेचने के लिए आता है।
देखकर मेरी आँखें भर आईं। सबकुछ भूलकर मैने उसी समय मिनी को बाहर बुलाया। विवाह की पूरी पोशाक और गहनें पहने मिनी शरम से सिकुड़ी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।
उसे देखकर रहमत काबुली पहले तो सकपका गया। उससे पहले जैसी बातचीत न करते बना। बाद में वह हँसते हुए बोला, "लल्ली! सास के घर जा रही हैं क्या?"
मिनी अब सास का अर्थ समझने लगी थी। मारे शरम के उसका मुँह लाल हो उठा।
मिनी के चले जाने पर एक गहरी साँस भरकर रहमत ज़मीन पर बैठ गया। उसकी समझ में यह बात एकाएक स्पष्ट हो उठी कि उसकी बेटी भी इतने दिनों में बड़ी हो गई होगी। इन आठ वर्षों में उसका क्या हुआ होगा, कौन जाने? वह उसकी याद में खो गया।
मैने कुछ रुपए निकालकर उसके हाथ में रख दिए और कहा, "रहमत! तुम अपनी बेटी के पास देश चले जाओ।"

मंगलवार, 2 मई 2017

तुम्हारे लिए :)



मेरी पोटली में ढेर सारे सपने हैं 
परियों की कहानियों जैसे 
और मैं खुद अलादीन का चिराग हूँ 
तुम्हारे लिए  :)

अम्मू नानी, अम्मू दादी 

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

कुनू अमू




कोयल आई कुहू कुहू
बोली ये है कुनू कुनू
आई गौरैया
मटक मटककर
बोली ये है अमू अमू
नानी की है कुनू कुनू
दादी की है अमू अमू
कुनू गाये कुहू कुहू
अमू थिरके मटक मटक
नानी लेती है बलैया
दादी लेती है बलैया
थू थू करके नज़र उतारे
सर पर रखकर हाथ
लेती है ईश्वर का नाम  ...

सूरज आता पूरब से
कहता है अपने रथ से
जागो कुनू
जागो अमू
सुबह हो गई
जागो जागो  ...

खिलखिलाकर उठती कुनू
इठलाकर देखती अमू
सूरज दादा आ जाओ
करती इशारे कुनू अमू
ये है मेरी कुनू अमू
मेरी साँसें कुनू अमू
कुनू अमू
कुनू अमू
चिड़िया पुकारे कुनू अमू
तितली पुकारे कुनू अमू

बोलो बोलो टाइगर
मिलना है क्या कुनू अमू से
बोला धीरे से टाइगर
गुर्ररर
मिलना है
मिलना है
मैं अपनी मम्मा के साथ आ रहा हूँ
बोली हँसके कुनू अमू
come come
आ जाओ
जल्दी जल्दी आ जाओ  ...

ऐ लायन ऐ लायन
मिलना है क्या कुनू अमू से
शेर दहाड़ा धीरे धीरे
और बोला
नई मिलना है नई मिलना है
मैं अपनी मम्मा के पास जा रहा हूँ
बोली हँसके कुनू अमू
go go go  ...

अब रात हो गई
बात गई
चंदा नाना आ गए
मिट्ठी लेकर कुनू अमू को
बोले चंदा
गुड नाइट :)

रविवार, 23 अप्रैल 2017

कुछ तुम समझो, कुछ हम समझें ...




कुछ तुम कहो - कुछ हम कहें :)
लम्बी लम्बी अबूझ भाषा में ......
जिसे कुछ तुम समझो,
कुछ हम समझें
...
जीवन को
बातों को
एक दूसरे को थामकर
समझना होता है
लो तुम मेरी ऊँगली पकड़ो
मैं तुम्हें अपनी हथेलियों की पकड़ में रखती हूँ
मंज़िल पाने के लिए
साथ साथ चलना ज़रूरी होता है
जिसे कुछ तुम समझो,
कुछ हम समझें

बिना कहानी के
सपनों का घोड़ा नहीं दौड़ता
कुछ नया कर दिखाने की
सुरंग नहीं बनाता
तो एक कहानी मैं सुनाती हूँ
फिर तुम सुनाओ
यादों का मीठा झरोखा ऐसे ही बनता है
जिसे कुछ तुम समझो,
कुछ हम समझें
... 

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

कुछ न कुछ तो बदलेगा न ,,




सोचती हूँ
एक सूरज खरीद लूँ
अँधेरे में रास्ता ढूँढ लेंगे
हर कदम पर
सूरज रख देंगे  ...

खरीद लाऊँ एक चाँद
कुछ सितारे
सिरहाने रखकर सोयेंगे
सपनों को उजाला देंगे

एक जादुई छड़ी भी ले लूँ
सबको परी बना देंगे
या फिर भोले को हाथी
काबुलीवाले को घर ले आएँगे

थोड़ी भक्ति
थोड़ा जज़्बा
थोड़ी विनम्रता
खरीद के ही सही
ले आएँगे
जो शहीद हो चुके हैं
उनकी कुर्बानी
याद करेंगे
सोने की चिड़िया हो जाए भारत"
यह आह्वान करेंगे।

एक सच्ची बात कहूँ
एक सूरज
एक चाँद,
कुछ सितारे
एक  जादू वाली छड़ी
थोड़ी भक्ति
थोड़ी विनम्रता
थोड़े जज़्बे की आग हमारे भीतर है
बस फूंक मारनी है
खुद को जीने का एहसास देना है
ताकि हौसले की चिंगारी
सामूहिक आग बने  ...

चलो
थोड़ा वक़्त
थोड़ी सीधी सोच
खरीद लें
कंदील की जगह टाँग दें
रौशन होगा घर
कुछ न कुछ तो बदलेगा न  ,,,


मंगलवार, 21 मार्च 2017

एक थी अच्छाई और एक थी बुराई






आओ कुनू जुनू
आज तुम्हें एक कहानी सुनाऊं
अच्छाई और बुराई की कहानी सुनोगी ?

अरे अरे डरो मत
कुछ नहीं सिखाउँगी
बस कहानी सुनाउँगी  ....
बहुत समय की बात है ,
एक थी अच्छाई
और एक थी बुराई (होने को तो आज भी हैं )
दोनों अपने अपने घर में रहते थे

अच्छाई
अपनी खिड़की से
बुराई को देख
मीठी सी मुस्कान देती
बुराई
धड़ाम से अपनी खिड़की बन्द कर देती
अच्छाई
मीठे बोल बोलती
बुराई
बुरे बोल बोलती ...

एक दिन भगवान
बारी बारी
 दोनों के घर आए
अच्छाई ने उनके चरण पखारे
जो कुछ उसके पास था
खाने को दिया
सोने के लिए चटाई दी
और पंखा झलती रही ....
भगवान् ने पूछा ,
सामने कौन रहती है ?
अच्छाई ने कहा - मेरी बहन
भगवान ने पूछा - नाम क्या है ?
अच्छाई कुछ देर चुप रही , फिर कहा - अच्छाई !
भगवान मुस्काए ,
उसके सर पर हाथ रखा
और चले गए ...

बुराई ने घर आते भगवान् को
यह कहते हुए रोका
किस हक़ से आ रहे हो ?
कौन हो तुम?
मैं भगवान ...."
बुराई ने कहा ,
सुनो,
अपना ये तमाशा
उस अच्छाई पर दिखाना
भगवान ने कहा ,
वह तो तुम्हारी बहन है न ?
बुराई ने तमककर कहा ...
उसे झूठ बोलने की आदत है
खुद को अच्छा दिखाने के लिए
सारे नाटक करती है
भगवान् ने कहा =
कुछ खाने को दोगी ?
बुराई ने कहा -
ना मेरे पास वक़्त है,
ना देने को खाना
और भगवान को निकल जाने को कहा
भगवान मुस्काए
और बिना कुछ कहे चले गए
.................
कैलाश जाकर
भगवान ने पार्वती से कहा -
अच्छाई कितनी भी कोशिश करेगी
बुराई को ढंकने की
बुराई उसे हटा देगी
और सारे इलज़ाम अच्छाई को देगी ....
...............
बच्चों मुझे सिखाना कुछ भी नहीं है
बस इतना बताना है
कि
'अच्छाई से बुराई को छुपाया नहीं जा सकता
और बुराई अच्छाई को कभी अच्छा नहीं कह सकती '
अब आगे जानो तुम
हम होते हैं गुम ......
:)

बुधवार, 15 मार्च 2017

माँ,पापा - जीवन में दोनों की मिलावट ज़रूरी है




गर्भनाल का एक हिस्सा माँ के अंदर
एक बच्चे के अंदर
नौ महीने का यह रिश्ता सबसे अनोखा
सबसे अनमोल होता है !
इस नाल के ख्याल में जो पिता
रात दिन सपनों के तार जोड़ता है
वह बहुत ख़ास होता है।
 माँ की असह्य तकलीफ में
हौसले का राग भरता है
बच्चे की पहली रुदन में
अपनी धड़कन जोड़ता है
उसकी ऊँगली पकड़कर
सारी दुनिया मुट्ठी में लगती है !
माँ बच्चे की तोतली प्रतिध्वनि बनती है
पिता सपनों का आधार
जीवन को सशक्त स्तम्भ बनाने के लिए
दोनों की मिलावट ज़रूरी है 

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

समय की तेजी भी कमाल की है




समय की तेजी भी कमाल की है 
अभी अभी हुई कुनू 
12 फरवरी को 
हो जाएगी पूरे 1 साल की 
और पीछे पीछे मटकती ये अमू 
यानि इस मंच की जुनू 
22 फरवरी को 
7 महीने की  ... 

दोनों की मासूम हँसी 
देती है हमें धोखा 
कि 
"यकीन करो,
हम कुछ नहीं समझते"
लेकिन पलक झपकते 
कुनू होती है किचेन में 
अमू ज़मीन पर 
अपनी अपनी खुराफातों संग 

खिलौने बच्चों के लिए होते हैं 
तो इनके लिए भी 
इनके आस-पास बैठे रहते हैं 
टेडी - मिक्की - टाइगर :)
पर खिलौना बन जाता है हमेशा 
एक कागज़ का टुकड़ा 
मोबाइल 
लैपटॉप 
आटा 
चप्पल  ... 
और ऐसी ही चीजें 

नहीं लुभाता इनको 
खिलौने में मोबाइल 
या बेकार हो गई मोबाइल 
इन्हें चाहिए होता है 
वही सबकुछ 
जो हम लिए होते हैं 
खाना भी हमारा ही अच्छा लगता है 

हप हप करते 
गुर्राते 
खिलखिलाते 
कुनू खड़ी होने लगी है 
अमू घुटने पर खुद को साधने लगी है 
समय हर पल एक नया करिश्मा दे जाता है 

करिश्मा चलता रहे,
......... 
12 को कहना ना भूलें 
कुनू हैप्पी बर्थडे :)

बुधवार, 18 जनवरी 2017

कुनू है जुनू है ... अब और क्या है सरगम :)




जानती हो कुनू जुनू - जुनू यानी अमू
नानी/दादी बनते ही बिना संगीत शिक्षा के मुझे सात सुर मिल गए
 जिसके लिए गीत की पंक्तियाँ गूंजती हैं,
"बड़ा ज़ोर है सात सुरों में,बहते आँसू जाते थम  ..."
तुमलोगों के चेहरे से शबनम टपकती है
मेरे तपते दिल को सुकून मिलता है :)
 अब और क्या है सरगम !

कितनी भी थकान हो
छुप्पाछुप्पी तुमदोनों के संग खेलना
जलतरंग सी खिलखिलाहट में भीगना
पूरी ताज़गी दे जाती है।
मुझे एहसास होता है
मैं कोई जादू की गुड़िया हूँ
थोड़ा झूमकर
थोड़ा मटककर
मैं हर ख़ुशियाँ ला सकती हूँ
टिप टिप टिप टिप आँखों को मटकाकर
तुम्हारे लिए कह सकती हूँ
"खुल जा सिम सिम "
तुम देखना मेरे प्यार का कमाल
यकीनन,
एक दिन खुल जायगी वह गुफा
उसमें से हीरे जवाहरातों की कौन कहे
निकलेगी सिन्ड्रेला
जिनी
अलादीन का चिराग होगा तुम्हारे पास
चाँदनी तुम्हारा स्नान करेगी
चाँद की माँ देगी मंतर निराला
काबुलीवाला आएगा पिस्ता बादाम लेकर
 बस बेटा
 इन सबको याद रखना
भूलने से सबको दुःख होता है
ऐसी तकलीफ किसी को मत देना
सिंड्रेला सा मन रखना

......... बोलो हाँ :)