रविवार, 12 जनवरी 2020

कुनू अमु चश्मा पहनके



कुनू अमु चश्मा पहनकर
जंगल घूमने गई,
वहाँ पे उनके लिए लायन ने 
चिकेन चावल बनाया ।
मंकी लाया अंगूर केला,
भेड़िया ने सलाद बनाया
वेलकम की तख्ती लगाकर
खरगोश खूब मुस्कुराया
हिरण ने तम्बोला खेलाया
तेंदुआ आइसक्रीम लाया ।
हाथी ने अपनी पीठ पे लेकर
कुनू अमु को घुमाया
ऊंट बोला
मैं भी हाज़िर हूँ तुम्हारे आगे
आओ चलो हम साथ चलकर
पूरा रेगिस्तान नापें ।
व्हेल बोली ओ कुनू अमु
आओ समन्दर के पास
यहाँ पे देखो नृत्य मेरा
तुम भी ठुमक के दिखाओ ।
लोमड़ी का सारा ध्यान
था उनके चश्मे पर
उसकी आंखें देखकर
गीदड़ समझ गया था,
उसके इशारे पे छोटा डॉगु
दौड़ा दौड़ा आया
इतनी जोर से भूका कि
लोमड़ी की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई
कुनू अमु स्माइल करके घर को वापस आई
कुनू अमु चश्मा पहनके ...

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

परियां होती हैं विश्वसनीय सपनों में





















विज्ञान नहीं बता सकता कभी कि परियां होती हैं या नहीं,
परियां होती हैं विश्वसनीय सपनों में,
बिना किसी अनुसन्धान के,
वे खेलने आ जाती हैं उन बच्चों के साथ,
उन बड़ों के साथ,
जिनकी सोच शतरंज की बिसात पर नहीं होती,
नहीं चलते जो रहस्यात्मक चाल,
बस जिनके अंदर होता है हमेशा,
एक विस्तृत हरा भरा मैदान,
जिनकी हथेलियों में होता है,
कुछ जादू सा कर दिखाने का हौसला,
जिनके एक इशारे पर,
परियां आ जाती हैं जादुई छड़ी लेकर,
कभी सब्ज़ परी,
तो कभी लाल परी बनकर ।
व्यवहारिक होकर,
तुम परियों तक नहीं पहुँच सकते,
ना ही बच्चों की आंखों में
ख्वाब भर सकते हो ।
किसी दिन,
किसी पल के लिए,
तुम अगर सांता नहीं बनते,
परियों की जीती जागती दुनिया नहीं बसा सकते,
तो तुम्हारे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से,
बच्चे कभी जुड़कर भी नहीं जुड़ेंगे,
तितलियों संग उड़ना नहीं सीखेंगे ...

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

आमीन



बच्चे की नींद
उसकी करवटों में,
उसकी कुनमुनाहट में,
उसके सुबक कर रोने में
एक माँ सिर्फ लोरी नहीं बनती,
हो जाती है सम्पूर्ण भागवत गीता ।
समय जो अनुभव देता है,
उसे नजरबट्टू की तरह
उसके रोम रोम से बांध देती है,
ताकि जो आँसू वजह-बेवजह
माँ की आँखों से बहे हैं,
वह भूले से भी बच्चे की आँखों में ना उतरें ...
पर,
जैसे जैसे वह चलना सीखता है,
माँ मन ही मन कहती है,
मैं हूँ तुम्हारे साथ,
लेकिन मेरी ऊँगली छोड़कर,
तुम्हें चलना होगा,
ताकि तुम कभी कहीं गिरो
क्योंकि,
बिना गिरे तुम उठना कैसे सीख पाओगे,
चोट नहीं लगी,
तो दूसरों का दर्द कैसे जानोगे !
जब तक मार्ग अवरुद्ध नहीं होंगे,
तब तक तुम अपने बल पर
कोई भी रास्ता नहीं ढूंढ पाओगे ।
इसलिए, आगे बढ़ो
मेरी दुआओं का कवच,
हमेशा तुम्हारे साथ
तुम्हारा हौसला बनेगा,
मैं कहीं भी रहूँ,
रहूँ या ना रहूँ
मैं हूँ तुम्हारे पास
- यह गहरा विश्वास
तुम्हें हमेशा विजयी बनाये ।
आमीन

गुरुवार, 28 मार्च 2019

सही कहा न ?



जब आदमी बहुत अकेला पड़ जाता है, किसी जंगल में, सुनसान रास्ते में फंस जाता है तब वह चाहता है कोई मिल जाए, कुछ कहकर मन को हल्का कर ले, रास्ते ढूंढ ले, सहयात्री बन रास्ता पार कर ले । अचानक किसी आहट पर मुड़ता है, मुस्कुराकर आगे बढ़ता है, वह आदमी बिना नज़र डाले आगे बढ़ जाता है । जंगल में बैठ जाता है, कोई मिले तो रास्ता ढूंढा जाए । समय गुजरता है, कोई व्यक्ति नहीं मिलता ।
फिर एक दिन ज्ञात होता है कि हम अकेले तो कभी थे ही नहीं, हमारी आत्मा कहने-सुनने को निरन्तर साथ थी, रास्ते किसी के बल पर नहीं ढूंढे जा सकते, खुद पर भरोसा करके बढ़ना होता है, कोलम्बस,वास्कोडिगामा कोई किसी के सहारे नहीं बनता । सहयात्री आत्मा के साथ हमारा पूरा शरीर होता है, बस बढ़ने की देरी है और आत्मविश्वास की ।
खुद पर विश्वास न हो तो किसी और पर कैसा विश्वास ?! सही कहा न ? 

शनिवार, 8 दिसंबर 2018

दुआ है, यह सबकुछ तुमलोगों के पिटारे में हमेशा हमेशा रहे ...



मेरे पास है तो एक जादुई छड़ी,मैं बना सकती हूँ इस दुनिया को सिंड्रेला की बघ्घी जैसा, जहाँ शेर,चीते,भालू,बन्दर,गिलहरी...सब तुमसे बातें करेंगे,तुमको जंगल की सैर कराएंगे,चंदामामा धरती पर उतरकर तुम्हारे संग आंखमिचौली खेलेंगे,सूरज चाचू अपने गर्म तवे पर रोटी बनायेंगे,और चंदामामा की माँ अपने हाथों तुम्हें खिलाएंगी । 
लेकिन, तुम्हारी झोली में इससे अधिक प्यारे जादू हैं, माँ-पापा,बुआ,मौसी,मामा ...और गर्म तवे पर रोटी बनाने के लिए नानी-दादी । शेर,खरगोश,भालू,बन्दर,गिलहरी तो इनकी कहानियों में रोज खड़े रहते हैं यह कहने को कि "बोलो मेरे आका,क्या खेलना है, कहाँ खेलना है" ।असली जादू इसे नहीं कहते,असली जादू है अपना घर, जहाँ भूखे रहकर भी जादू देखने को मिलता है । इसमें होता है प्यार और सम्मान ।यह न हो तो कोई सपना नहीं ठहरेगा, ना ही कोई जादू । और यह जादू होता है पापा,माँ की सुरक्षा में,नानी/दादी के बिगाड़ते प्यार में (ऐसा कहा जाता है)और पूरे दिन की छोटी छोटी खुशियों में । और मेरी दुआ है, यह सबकुछ तुमलोगों के पिटारे में हमेशा हमेशा रहे ...  

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

अपनी जड़ों से विमुख मत होना !




ज़माना - कभी एक सा नहीं रहता मेरी परियों,
बदलता रहता है !
मौसम बदलता है,
घर बदलता है,
शहर, देश  ...
परिवर्तन एक स्वाभाविक क्रिया है।
महत्वपूर्ण बात यह है
कि ,
परिवर्तन कैसा है !
सब अपना रहे,
यह सोचकर,
तुम भी मत अपना लेना।
देखना,विचारना,
अपने आप को तौलना,
बात को तौलना,
फिर उसे स्वीकार,
अस्वीकार करना  ...
किसी भी बहाव में,
अपने अस्तित्व को मत नकारना,
गुरु के अस्तित्व को मत नकारना,
बुज़ुर्गों के अस्तित्व को मत नकारना  ...
"मातु पिता गुरु प्रभु के बानी।
बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी॥"
परिवर्तन जैसा भी हो,
 इसे मत भूलना
अपनी जड़ों से विमुख मत होना !

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

कुनू / अमु - आओ सीखें अच्छी बात










अलका आंटी के साथ परीलोक की सैर करो, और परियों के संग खेलते हुए सीखो एक अच्छी बात ! 


Alka Srivastava 
#परीलोक_की_सैर
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झिलमिल और रिमझिम दो बहुत पक्की सहेलियाँ थीं। क्लास हो या प्ले ग्राउंड, दोनों एक साथ रहती। एक साथ टिफिन करतीं और एक दूसरे के पास बैठती। दोनों का घर भी एक दूसरे के पड़ोस में था इसलिए दोनों एक साथ ही स्कूल जाती और एक साथ ही स्कूल से वापस घर आतीं।
एक दिन रिमझिम के पापा नया रंगीन टीवी लाए। पूरे मोहल्ले में शायद वह पहला रंगीन टीवी था। रिमझिम के घर शाम को बच्चों की भीड़ लगने लगी। इस तरह बच्चों ने शाम को बाहर पार्क में खेलना बंद कर दिया। पढ़ाई के साथ खेल कितना जरूरी है ये बात जानते हुए भी बच्चे शाम को डोरेमान देखने का लालच छोड़ नहीं पाते थे। बच्चे पढ़ाई के बीच मिलने वाला एक घंटे का समय जो पहले एक साथ पार्क में खेलकर बिताते थे अब एक घंटा टीवी देखकर बिताने लगे।
बाकी बच्चे तो फिर भी एक ही घंटा टीवी देखते थे। लेकिन रिमझिम को जब भी मौका मिलता टीवी देखने बैठ जाती। इसतरह रिमझिम की पढ़ाई पर तो असर हुआ ही उसकी आँखो पर भी बुरा प्रभाव पड़ा। छः महीने के अंदर ही उसको चश्मा लग गया।
अगले दिन जब रिमझिम चश्मा लगाकर स्कूल पंहुची तो उसके सभी दोस्तों ने उसे चिश्मिश कहकर चिढ़ाना शुरु कर दिया। रिमझिम को चिश्मिश सुनना बहुत खराब लगा। फिर भी वह किसी से कुछ नहीं बोली। लेकिन जब झिलमिल ने भी उसे चिश्मिश कहकर चिढ़ाया तो उसे बहुत बुरा लगा वह झिलमिल से नाराज हो गयी। यहाँ तक कि उसने झिलमिल से बोलना भी बंद कर दिया।
अभी तक दो पक्की सहेलियाँ एक साथ दिखती थीं आज अलग अलग दिख रहीं थीं। दोनों ने अलग अलग अपना लंच किया और अलग अलग स्कूल से घर भी गयीं। शाम को झिलमिल रिमझिम के घर टीवी देखने भी नहीं गयी। अगले दिन संडे था। उस दिन सुबह भी दोनों एक दूसरे से नहीं मिलीं।
दोपहर को झिलमिल दादी के पास चली आई। उसके चेहरे पर उदासी थी। दादी समझ गयीं जरूर कोई बात हुई है। उन्होंने झिलमिल के सिर पर हाथ फिराते हुए पूछा,
"क्या बात है झिलमिल बेटा! आज बहुत उदास लग रही हो? कल से तुम रिमझिम के घर टीवी देखने भी नहीं गयी।"
"दादी माँ! रिमझिम मुझसे बहुत नाराज है।"
"क्यों? ऐसा क्या कर दिया तुमने?"
"कुछ नहीं दादी माँ..मैंने बस उसे चिश्मिश कह दिया था इसलिए वह नाराज हो गयी।"
"क्या रिमझिम चश्मा लगाने लगी है?"
"हाँ दादी माँ"
"ओह!! लगता है वह टीवी बहुत देखती है।
कल मैं उससे बात करूँगी।"
"नहीं दादी माँ! आप उससे बात न करना। वह बहुत घमंडी हो गयी है।"
"अरे!!! इतनी छोटी सी उम्र में ये घमंडी बोलना कैसे सीख लिया?"
"साॅरी दादी माँ"
"साॅरी मुझे नहीं..कल रिमझिम को बोलना।"
"ठीक है दादी माँ! अब कोई कहानी सुनाओ न..
झिलमिल ने दादी के गले में बाँहें डालते हुए कहा तो दादी ने मुस्कुराते हुए कहानी सुनानी शुरू कर दी।
"दूर बादलों के पार एक परीलोक है, जहाँ रंग बिरंगी परियाँ रहती हैं। खूबसूरत पोशाकों में सजी हुई। वे सब खूब खेलती कूदती मस्ती करती हैं। लेकिन सभी परियाँ बहुत अच्छी हैं एक दूसरे की मदद को हमेशा तैयार रहती हैं।"
"दादी माँ! क्या मैं भी परीलोक जा सकती हूँ?"
झिलमिल परीलोक जाने के लिए बड़ी उत्साहित थी। परीलोक के नाम से ही उसकी आँखों में चमक आ गयी थी।
"हाँ हाँ! बहुत देर हो गई चलो अब थोड़ी देर आराम कर लो।"
दादी ने जम्हाई ली और चादर ओढ़ ली। झिलमिल दादी के पास लेटी तो थी लेकिन वह बादलों के पार परीलोक की तस्वीरें अपने दिमाग में बना रही थी। तभी उसको ऐसा लगा बाहर खिड़की के पास कोई खड़ा है और धीरे धीरे उसका नाम पुकार रहा है। पहले तो वो कुछ डरी लेकिन फिर हिम्मत करके धीरे से बाहर आ गई। दादी आराम से सो रहीं थीं।
बाहर आते ही उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गयीं। सामने दो परियाँ खड़ी थीं, खूबसूरत रंग बिरंगी जैसी उसकी दादी ने बताई थीं, ठीक वैसी ही। उसने अपनी पलकें कई बार झपकाईं, उसे तो अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। तभी एक परी ने मुस्कुराते हुए कहा,
"झिलमिल! तुम परीलोक देखना चाहती थी न? इसलिए हम तुम्हें लेने आए हैं। चलोगी हमारे साथ?"
"हाँ हाँ क्यों नहीं? चलो..लेकिन मेरे तो पंख नहीं हैं मैं बादलों तक कैसे पँहुचूगीं?"
"कोई बात नहीं तुम बस अपनी आँखें बंद कर लो।"
झिलमिल ने अपनी आंखें बंद कर लीं और दोनों परियों का हाथ पकड़ लिया। कुछ देर बाद परियों ने उसे आंखें खोलने को कहा। झिलमिल ने जैसे ही आंखें खोलीं वह दंग रह गयी। उसने देखा वह सफेद रुई जैसे बादलों के ऊपर है। सामने ढेर सारी परियाँ उसके स्वागत के लिए खड़ी थीं। तभी रानी परी जो सुनहरे रंग का मुकुट लगाए थीं बोली,
"झिलमिल परियों के देश में तुम्हारा स्वागत है। तुम दिन भर आराम से यहाँ घूम सकती हो।"
झिलमिल खुश हो गयी। इस वक्त उसे लग रहा था कि वह जादू की नगरी में है। सामने छोटे छोटे पहाड़ थे, जो सोने जैसे चमक रहे थे। उसपर पत्थरों की जगह तरह तरह की चाॅकलेट लगीं थीं। बाग में सुनहरे रंग के पेड़ थे। जिनपर रंग बिरंगे रसदार फल थे। कुछ दवाइयों केपेड़ थे। जिनके रस का सेवन करने से कोई भी बीमारी ठीक हो सकती थी। पास ही एक झरना था जिससे मीठा शरबत जैसा पानी बह रहा था।
झिलमिल सारा दिन वहाँ खेलती रही। जब बहुत देर हो गयी तो उसे घर की याद आने लगी। वह उदास हो गयी। रानी परी ये बात समझ गयी। वो बोलीं,
"झिलमिल तुम घर जाना चाहती हो न?"
"हाँ रानी परी!"
"ठीक है हम तुमको घर भेजने का इंतजाम करते हैं। लेकिन जाने से पहले हम तुम्हें कुछ उपहार देना चाहते हैं। तुमको जो कुछ भी चाहिए ले सकती हो।"
"रानी परी! मेरी सहेली रिमझिम की नजरें कमजोर हो गयीं हैं। वो चश्मा लगाकर ज़रा भी अच्छी नहीं लगती है। आप कोई ऐसी दवा दीजिए जिससे उसकी आँखें ठीक हो जाएँ।"
रानी परी ने खुश होते हुए कहा,
"झिलमिल तुम्हारे सामने कितनी ढेरों चीजें हैं लेकिन तुमने उनमें से अपने लिए कुछ न माँग कर अपनी सहेली के लिए माँगा। जबकि तुम्हारी सहेली तुमसे नाराज़ है और उसने तुमसे बोलना भी बंद कर दिया है फिर भी तुमने उसका ख्याल रखा। तुम्हारी सहेली बहुत लकी है जो उसको तुम्हारे जैसी दोस्त मिली। मैं अभी तुमको दवा देती हूँ। लेकिन अपनी सहेली को बोलना कि वह टीवी कम देखे और खूब हरी सब्जी खाए। ऐसा करने से जल्दी ही उसकी आंखें ठीक हो जाएँगी"
तभी झिलमिल को रिमझिम की आवाज सुनाई दी। शाम हो गयी थी रिमझिम बाहर खेलने के लिए उसे बुला रही थी। झिलमिल ने दौड़कर रिमझिम को गले लगा लिया।