शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

अलका श्रीवास्तव आंटी की बातों को ध्यान से पढ़ना






#अपने_नन्हें_दोस्तों_से_कुछ_बातें 
अलका श्रीवास्तव जी की 

बच्चों आज मदर्स डे नहीं है तो क्या हुआ? माँ के लिए कुछ लिखना हो तो हर दिन लिख सकते हैं। आज भी कल भी और चाहें तो मदर्स डे वाले दिन भी। 

खैर आज मैं आप सब नन्हें दोस्तों से सीधे बात करना चाहती हूँ। उनको आज चंपकवन की कहानी नहीं सुनाऊंगी बल्कि आज मैं मिलवाऊंगी अपने चंपकवन के दोस्तों की मम्मियों से..
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🐘 गज्जू को तो सभी जानते होंगे..वो दो साल का हाथी का बच्चा है। जैसे आपकी मम्मी, आपको, पापा की डाँट से बचाती हैं, वैसे ही  गज्जू की मम्मी भी उसके पापा से उसे बचाती हैं । उसके पापा से उसकी सुरक्षा करती हैं।
 
क्या आपको पता है.. हाथियों के झुंड मे कोई भी मेल हाथी दूसरे मेल हाथी को बर्दाश्त नहीं कर सकते। फिर चाहे वो उनका बेटा ही क्यों न हो। ऐसे में किसी भी मेल शिशु का जन्म होने पर उसकी मां उसकी हिफाज़त करती है और दूसरी मम्मी हथनियाँ उसका साथ देती हैं ताकि पापा हाथी,  बच्चे को कोई नुकसान न पहुँचा पाए। 

🐟 ये है मिष्ठी। इसकी एक मौसी हैं #माउथ_ब्रूडर...जो गहरे समुद्र में रहती हैं। एक बार छुट्टियों में मिष्ठी अपनी मौसी के पास गयी। वहाँ उसे बहुत मजा आया। वो अपनी मौसी माउथ ब्रूडर के बच्चों के साथ मौसी के गले के आस पास घूमती रहती थी और जैसे ही सामने से कोई खतरा आता था मौसी सब बच्चों को अपने मुँह में छिपा लेती थी। और जब खतरा टल जाता तो मिष्ठी और मौसी के बच्चे मुँह से बाहर आ जाते थे। और फिर उनका ऊधम चालू हो जाता था। इस तरह मौसी माँ अपने बच्चों की हिफ़ाजत करती हैं। 

🐒मीकू बंदर की एक बुआ हैं #बबून। वो अपने बच्चों को इस तरह सजाती संवारती हैं मानो बच्चों को गाड़ी में बैठकर स्कूल जाना हो। बबून बुआ अपनी उंगलियों से बच्चों के शरीर के एक एक भाग की सफाई करती हैं और बच्चों के शरीर में चिपके कीड़े और मृत त्वचा को खाती जाती हैं। जबसे मीकू की मम्मी बबून बुआ के पास से होकर आई हैं तबसे वो भी कभी कभी मीकू की ऐसी ही सफाई करती हैं।

चंपकवन के पास सुंदरवन में पक्षियों की एक जाति रहती है राजहंस..🐣बेबी राजहंस की 🐤मम्मियाँ भी अपने बच्चों की सफाई बहुत अच्छे से करती हैं। मम्मी राजहंस अपनी चोंच से बेबी राजहंस के शरीर पर जमी धूल हटाती हैं और साथ ही उसके पंखों पर प्राकृतिक तेल की एक परत भी लगा देती है। आप सोच रहे होंगे कि मम्मी राजहंस के पास ये तेल कहाँ से आया? 
दरअसल मम्मी राजहंस के शरीर में तेल ग्रन्थियाँ होती हैं जिससे तेल निकालकर वो बेबी राजहंस के पंखों पर लगा देती हैं। इससे बेबी राजहंस के पंखों पर पानी का असर नहीं होता है।

ये तो आप सभी जानते हो कि 🐹 किटी की 🐱मम्मी के नाखून और दाँत बहुत पैने हैं। जिनसे वो किसी भी जानवार को पछाड़ सकती हैं। जब किटी बहुत छोटी थी और उसने चलना नहीं सीखा था तब उसकी मम्मी अपने दाँतों से उसको एक जगह से दूसरी जगह ले जाती थीं लेकिन मजाल है जो एक भी दाँत किटी की मुलायम त्वचा को जरा भी नुकसान पंहुचा पाता।

इसी तरह 🐯 शेरू की मम्मी दिखने में बहुत  खतरनाक हैं लेकिन वो भी शेरू को बहुत ही सावधानी से मुँह से पकड़ कर एक जगह से दूसरी जगह ले जाती थीं। 

ये सभी मम्मियाँ अपने बच्चों को बहुत प्यार करती हैं उनका बहुत अच्छे से ख्याल रखती हैं। 

लेकिन बच्चे उनकी भलमनसाहत का फायदा नहीं उठा सकते हैं। जैसे आप बच्चों की मम्मियाँ आपसे कोई गल्ती होने पर आपको कूट पीट देती हैं। ठीक वैसे ही शेरू की मम्मी शेरू की शरारत पर उसे मुँह से उठाकर धीमे से जमीन पर पटक देती हैं। शेरू समझ जाता है कि उसकी मम्मी नाराज हैं। और ऐसे में शेरू उन्हें मनाने और माफी माँगने के लिए उनसे  लिपट जाता है और जैसे आपकी मम्मी आपके sorry बोलने पर आपको माफ कर देती हैं वैसे ही शेरू की मम्मी भी उसे माफ कर देती है। आखिर वो भी एक माँ ही तो है। 

बच्चों इस तरह आपने देखा कि चंपकवन के जानवरों की मम्मियाँ अपने बच्चों का कितना ख्याल रखती हैं। बिल्कुल आपकी मम्मी की तरह। आपकी मम्मी भी तो आपको बहुत प्यार करती हैं न? हाँ शैतानी करने पर डाँट भी देती होंगी? और कभी कभी आपसे नाराज भी हो जाती हैं? 
कोई बात नहीं आप उनको साॅरी बोल दिया करो। देखना वो झट से मान जाएँगी।
चलो फटाफट अपनी मम्मी को #आई_लव_यू बोलो ❤❤

(बच्चे ही क्यों आप बड़े भी (बिना संकोच)अपनी मम्मी  को आई लव यू बोल सकते हैं। उनको अच्छा लगेगा....

 अल्का श्रीवास्तव

सोमवार, 22 जनवरी 2018

मीठी बातों से कभी मत बचना




मीठी बातों से कभी मत बचना 
मीठी बातें जब नश्तर बन चुभती हैं 
तभी 
अनुभव के 
आत्ममंथन के 
दरवाज़े खुलते हैं !
और 
जब तक वे दरवाज़े नहीं खुलते 
तुम जो जीते हो 
वह बस एक बचकाना खेल है !
बचपन को पास रखो 
लेकिन हाँ
बचपना मत दिखाओ 
... 
निःसंदेह,
मीठी बातें मन को सहलाती हैं 
लोरी सी लगती हैं
पर
अजीबोगरीब हालात वहीं से बनते हैं 
मीठी बातें हद से अधिक हो
तो जीने का सही सलीका नहीं आता
सिर्फ मीठा खाओ
तो दांत सड़ जाते हैं 
तालमेल बहुत ज़रूरी है
सीखने के लिए
कुछ बनने के लिए
तीखे बोल रामबाण होते हैं
मुमकिन है 
आज बुरा लगे
लेकिन समय के साथ 
उसकी बारीकियाँ मुस्कान दे जाती हैं 
  

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

आओ सीखें जीवन आओ खेलें जीवन




आओ सीखें जीवन 
आओ खेलें जीवन 
लक्ष्य साधें जीवन का 
कर्म करें जीवन का 
... 
पानी है जीवन
प्रकृति का रोम रोम है जीवन 
ब्रह्ममुहूर्त में उठकर
 पाओ सुंदर जीवन 
समय से सो जाओ और जानो 
कैसे बनता जीवन 
... 
बड़ों का करना सम्मान
झुककर उनके छूना पाँव 
उनके कहे को मान के चलना 
होगा बेहतर जीवन
... 
बात बात में रोना 
नहीं जीवन का सही अर्थ है
बेबात कहीं पे हंसने लगना
नहीं जीवन का सही रूप है
... 
अटलता  है जीवन 
बहना है जीवन 
जीवन है खुशबू से भरना 
और भर जाना 
अपने रोम रोम को साधना 
.....
ठोकर लगे तो डर मत जाना
यूँ ही चलना सिखाता है जीवन
नहीं घबराना बन्द रास्तों से
आत्मविश्वास और धैर्य से
उन्हें खोलना सिखाता है जीवन ...

आओ सीखें जीवन 
आओ खेलें जीवन 

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

सुनो कुनू अमु सुनो




कुनू कुनू अमु अमु
तुम हो मेरी जान
मैं तुमपे कुर्बान ...
तितली सी जब उड़ती हो
मैं भी बन जाती हूँ तितली
जंगल के राजा को पकड़ के
देखो लाती है नानी दादी
हाथी कहता है
कहाँ है कुनू
बोलो कहाँ है अमु
बिठाओ उनको मेरी पीठ पे
सैर कराऊँ
उनकी शान बढाऊँ
इनदोनों परियों को खूब घुमाउँ  ...
चालाक लोमड़ी
भागके छुप जाती है
समझ गई है
कुनू अमु के आगे
नहीं चलेगी उसकी चालाकी
कोयल सुनाती है मीठे मीठे गीत
कहती है ये दोनों मेरी सहेली !
तुमदोनों जब मुझसे लिपट लिपटकर
मुझको बुलाती हो
मेरी आँखें
खुशी के मारे
ध्रुवतारा बन जाती हैं
ओ मेरी कुनू
ओ मेरी अमु
तुझपे कुर्बान
है मेरी जान :)

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

कुनू जुनू - ब्रह्ममुहूर्त से रिश्ता कायम करना





प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!
तूने कैसे पहचाना?
कहाँ, कहाँ हे बाल-विहंगिनि!
पाया तूने वह गाना?
सोयी थी तू स्वप्न नीड़ में,
पंखों के सुख में छिपकर,
ऊँघ रहे थे, घूम द्वार पर,
प्रहरी-से जुगनू नाना।

शशि-किरणों से उतर-उतरकर,
भू पर कामरूप नभ-चर,
चूम नवल कलियों का मृदु-मुख,
सिखा रहे थे मुसकाना।

स्नेह-हीन तारों के दीपक,
श्वास-शून्य थे तरु के पात,
विचर रहे थे स्वप्न अवनि में
तम ने था मंडप ताना।
कूक उठी सहसा तरु-वासिनि!
गा तू स्वागत का गाना,
किसने तुझको अंतर्यामिनि!
बतलाया उसका आना!  ...  

इसे प्रकृति कवि पंत ने लिखा है , और तुम्हारी नानी/दादी का प्रकृति से जुड़ा नाम उन्होंने ही रखा है। (यह तो मैं बता ही चुकी हूँ ) मेरा नाम विशेष है, क्योंकि इसके लिए मेरे पापा ने कहा था - "बेटी, तुम रश्मि ही बनना" 

प्रकृति कवि ने मुझे सूर्य के साथ जोड़ दिया, सूर्य की सारी तपिश को बांटकर एक एक रश्मि धरती के कोने कोने में आह्लादित होती है, सुबह से शाम तक जीवन राग सुनाती है। 

सूर्य रश्मि और एक पक्षी में गजब का संबंध होता है - दोनों ब्रह्ममुहूर्त का प्रथम राग बनते हैं 
सृष्टि सुषुप्तावस्था से उबरती है प्रथम रश्मि और रंगिणी के घोसले से आती चहचहाहट से, मन्त्रों का शंखनाद होता है, अजान के स्वर गूंजते हैं, गुरवाणी मुखरित होती है, बुद्ध की शरण में मन अग्रसर होता है  . 

यह सब कहने, बताने का एक ही लक्ष्य है कि तुमदोनों ब्रह्ममुहूर्त से रिश्ता कायम करना 
सृष्टिकर्ता ब्रह्मा तभी मिलते हैं 
रचनात्मकता उनसे ही मिलती है 
तात्पर्य यह कि जीवन को सीखने के लिए 
रंगिणी बनना 
समय की उपयोगिता समझना 
जब भी कहीं कोई प्रश्न अँधेरा बनकर खड़ा हो 
ब्रह्ममुहूर्त में हाथ में जल लेकर 
सूर्य का स्वागत करना 
तुम्हें समाधान मिलेगा 
और हर समाधान के साथ ढेरों कहानियाँ 
जिन्हें तुम सुनाना

रविवार, 5 नवंबर 2017

कुनू जुनू - ये है तुम्हारी नानी/दादी की कहानी




आज मैं तुमदोनों को प्रकृति कवि सुमित्रानंदन पन्त से मिलवाने समय के उस बिन्दू पर ले चलती हूँ,जहाँ मुझे नहीं पता था कि वे कौन हैं ,उनकी महत्ता क्या है !
नन्हा बचपन,नन्हे पैर,नन्ही तिलस्मी उड़ान सपनों की और नन्ही-नन्ही शैतानियाँ- उम्र के इसी अबोध,मासूमियत भरे दिनों में मैं पूरे परिवार के साथ इलाहाबाद गई थी। पापा,अम्मा, हम पाँच भाई-बहन -छोटे भाई के फूल संगम में प्रवाहित करने गए थे। उम्र को मौत के मायने नहीं मालूम थे, बस इतना पता था कि वह नहीं है - फूल,संगम .... अर्थ से बहुत परे थे।
आंसुओं में डूबे दर्द के कुछ टुकड़े मेरे पापा,मेरी अम्मा ने संगम को समर्पित किया, पानी की लहरों के साथ लौटती यादों को समेटा और लौट चले वहां , जहाँ हम ठहरे थे। हाँ , संगम का पानी और अम्मा की आंखों से गिरते टप-टप आंसू याद हैं। और याद है कि हम कवि पन्त के घर गए (जो स्पेनली रोड पर था)। अम्मा उन्हें 'पिता जी' कहती थीं,कवि ने उनको अपनी पुत्री का दर्जा दिया था, और वे हमारे घर की प्रकृति में सुवासित थे, बाकी मैं अनजान थी।
उस उम्र में भी सौंदर्य और विनम्रता का एक आकर्षण था, शायद इसलिए कि वह हमारे घर की परम्परा में था।
जब हम उनके घर पहुंचे, माथे पर लट गिराए जो व्यक्ति निकला.....उनके बाल मुझे बहुत अच्छे लगे,बिल्कुल रेशम की तरह - मैं बार-बार उनकी कुर्सी के पीछे जाती.....एक बार बाल को छू लेने की ख्वाहिश थी। पर जब भी पीछे जाती, वे मुड़कर हँसते..... और इस तरह मेरी हसरत दिल में ही रह गई।
उनके साथ उनकी बहन 'शांता जोशी' थीं, जो हमारे लिए कुछ बनाने में व्यस्त थीं । मेरे लिए मीठा,नमकीन का लोभ था, सो उनके इर्द-गिर्द मंडराती मैंने न जाने कितनी छोटी-छोटी बेकार की कवितायें उन्हें सुनाईं.....कितना सुनीं,कितनी उबन हुई- पता नहीं, बस रिकॉर्ड-प्लेयर की तरह तुम्हारी नानी/दादी बजती गई ।
दीदी,भैया  ने एक जुगलबंदी बनाई थी -
'सुमित्रानंदन पन्त
जिनके खाने का न अंत', .... मैं फख्र से यह भी सुनानेवाली ही थी कि दीदी,भैया ने आँख दिखाया और मैं बड़ी मायूसी लिए चुप हो गई !
फिर पन्त जी ने अपनी कवितायें गाकर सुनाईं, माँ और दीदी ने भी सुनाया..... मैं कब पीछे रहती -सुनाया,'नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए....'
उसके बाद मैंने सौन्दर्य प्रिय कवि के समक्ष अपने जिज्ञासु प्रश्न रखे - ' नाना जी, पापा हैं तो अम्मा हैं, मामा हैं तो मामी , दादा हैं तो दादी......फिर यहाँ नानी कहाँ हैं?'प्रकृति कवि किसी शून्य में डूब गए, अम्मा, पापा सकपकाए , मैं निडर उत्तर की प्रतीक्षा में थी (बचपन में माँ,पिता की उपस्थिति में किसी से डर भी नहीं लगता न )। कुछ देर की खामोशी के बाद कवि ने कहा ,'बेटे, तुमने तो मुझे निरुत्तर कर दिया,इस प्रश्न का जवाब मेरे पास नहीं....' क्या था इन बातों का अर्थ, इससे अनजान मैं अति प्रसन्न थी कि मैंने उनको निरुत्तर कर दिया, यानि हरा दिया।
इसके बाद सुकुमार कवि ने सबका पूरा नाम पूछा - रेणु प्रभा, मंजु प्रभा , नीलम प्रभा , अजय कुमार और मिन्नी !
सबके नाम कुछ पंक्तियाँ लिखते वे रुक गए, सवाल किया - 'मिन्नी? कोई प्रभा नहीं ' - और आँखें बंदकर कुछ सोचने लगे और अचानक कहा - 'कहिये रश्मि प्रभा , क्या हाल है?' अम्मा ,पापा के चेहरे की चमक से अनजान मैंने इतराते हुए कहा -'छिः ! मुझे नहीं रखना ये नाम ,बहुत ख़राब है। एक लडकी-जिसकी नाक बहती है,उसका नाम भी रश्मि है................' पापा ने डांटा -'चुप रहो', पर कवि पन्त ने बड़ी सहजता से कहा, 'कोई बात नहीं , दूसरा नाम रख देता हूँ' - तब मेरे पापा ने कहा - 'अरे इसे क्या मालूम, इसने क्या पाया है....जब बड़ी होगी तब जानेगी और समझेगी ।'
जैसे-जैसे समय गुजरता गया , वह पल और नाम मुझे एक पहचान देते गए ।
वह डायरी अम्मा ने संभालकर रखा है , जिसमें उन्होंने सबके नाम कुछ लिखा था। मेरे नाम के आगे ये पंक्तियाँ थीं,
' अपने उर की सौरभ से
जग का आँगन भर देना'...........
कवि का यह आशीर्वाद मेरी ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा बन गया......इस नाम के साथ उन्होंने मुझे पूरी प्रकृति में व्याप्त कर दिया ।

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

पहचान क्या है ?






पहचान क्या है ?
लोगों की जुबां पर एक नाम
इतिहास के पन्नों पर दर्ज़ नाम
या चक्करघिन्नी सी चलती मां !
जो शहर शहर नहीं घूम पाती
बड़े बड़े समारोहों में नहीं दिखती
लेकिन सुबह से शाम तक
मन ही मन
दुअाओं के बोल बोलती है !
मा चिड़िया जैसी होती है
सामर्थ्य से अधिक भरती है उड़ान
चूजे भी रह जाते हैं हैरान
फिर गहराता है उनका विश्वास
मां तो जादूगर है
धरती को समतल कर सकती है
पहाड़ बना सकती है
बून्द बून्द जोड़कर नदी बना सकती है
उसकी पहचान उसके बच्चों में होती है
ज़िंदगी के हर घुमावदार रास्तों पर्
मां होठों पर् मंत्र की तरह उभर अाती है
पहचान क्या है - इस बात से परे
चाभी के गुच्छों सी मां
एक निवाले सी मां
अपनी पहचान बना ही जाती है !!!