गुरुवार, 9 नवंबर 2017

कुनू जुनू - ब्रह्ममुहूर्त से रिश्ता कायम करना





प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!
तूने कैसे पहचाना?
कहाँ, कहाँ हे बाल-विहंगिनि!
पाया तूने वह गाना?
सोयी थी तू स्वप्न नीड़ में,
पंखों के सुख में छिपकर,
ऊँघ रहे थे, घूम द्वार पर,
प्रहरी-से जुगनू नाना।

शशि-किरणों से उतर-उतरकर,
भू पर कामरूप नभ-चर,
चूम नवल कलियों का मृदु-मुख,
सिखा रहे थे मुसकाना।

स्नेह-हीन तारों के दीपक,
श्वास-शून्य थे तरु के पात,
विचर रहे थे स्वप्न अवनि में
तम ने था मंडप ताना।
कूक उठी सहसा तरु-वासिनि!
गा तू स्वागत का गाना,
किसने तुझको अंतर्यामिनि!
बतलाया उसका आना!  ...  

इसे प्रकृति कवि पंत ने लिखा है , और तुम्हारी नानी/दादी का प्रकृति से जुड़ा नाम उन्होंने ही रखा है। (यह तो मैं बता ही चुकी हूँ ) मेरा नाम विशेष है, क्योंकि इसके लिए मेरे पापा ने कहा था - "बेटी, तुम रश्मि ही बनना" 

प्रकृति कवि ने मुझे सूर्य के साथ जोड़ दिया, सूर्य की सारी तपिश को बांटकर एक एक रश्मि धरती के कोने कोने में आह्लादित होती है, सुबह से शाम तक जीवन राग सुनाती है। 

सूर्य रश्मि और एक पक्षी में गजब का संबंध होता है - दोनों ब्रह्ममुहूर्त का प्रथम राग बनते हैं 
सृष्टि सुषुप्तावस्था से उबरती है प्रथम रश्मि और रंगिणी के घोसले से आती चहचहाहट से, मन्त्रों का शंखनाद होता है, अजान के स्वर गूंजते हैं, गुरवाणी मुखरित होती है, बुद्ध की शरण में मन अग्रसर होता है  . 

यह सब कहने, बताने का एक ही लक्ष्य है कि तुमदोनों ब्रह्ममुहूर्त से रिश्ता कायम करना 
सृष्टिकर्ता ब्रह्मा तभी मिलते हैं 
रचनात्मकता उनसे ही मिलती है 
तात्पर्य यह कि जीवन को सीखने के लिए 
रंगिणी बनना 
समय की उपयोगिता समझना 
जब भी कहीं कोई प्रश्न अँधेरा बनकर खड़ा हो 
ब्रह्ममुहूर्त में हाथ में जल लेकर 
सूर्य का स्वागत करना 
तुम्हें समाधान मिलेगा 
और हर समाधान के साथ ढेरों कहानियाँ 
जिन्हें तुम सुनाना

रविवार, 5 नवंबर 2017

कुनू जुनू - ये है तुम्हारी नानी/दादी की कहानी




आज मैं तुमदोनों को प्रकृति कवि सुमित्रानंदन पन्त से मिलवाने समय के उस बिन्दू पर ले चलती हूँ,जहाँ मुझे नहीं पता था कि वे कौन हैं ,उनकी महत्ता क्या है !
नन्हा बचपन,नन्हे पैर,नन्ही तिलस्मी उड़ान सपनों की और नन्ही-नन्ही शैतानियाँ- उम्र के इसी अबोध,मासूमियत भरे दिनों में मैं पूरे परिवार के साथ इलाहाबाद गई थी। पापा,अम्मा, हम पाँच भाई-बहन -छोटे भाई के फूल संगम में प्रवाहित करने गए थे। उम्र को मौत के मायने नहीं मालूम थे, बस इतना पता था कि वह नहीं है - फूल,संगम .... अर्थ से बहुत परे थे।
आंसुओं में डूबे दर्द के कुछ टुकड़े मेरे पापा,मेरी अम्मा ने संगम को समर्पित किया, पानी की लहरों के साथ लौटती यादों को समेटा और लौट चले वहां , जहाँ हम ठहरे थे। हाँ , संगम का पानी और अम्मा की आंखों से गिरते टप-टप आंसू याद हैं। और याद है कि हम कवि पन्त के घर गए (जो स्पेनली रोड पर था)। अम्मा उन्हें 'पिता जी' कहती थीं,कवि ने उनको अपनी पुत्री का दर्जा दिया था, और वे हमारे घर की प्रकृति में सुवासित थे, बाकी मैं अनजान थी।
उस उम्र में भी सौंदर्य और विनम्रता का एक आकर्षण था, शायद इसलिए कि वह हमारे घर की परम्परा में था।
जब हम उनके घर पहुंचे, माथे पर लट गिराए जो व्यक्ति निकला.....उनके बाल मुझे बहुत अच्छे लगे,बिल्कुल रेशम की तरह - मैं बार-बार उनकी कुर्सी के पीछे जाती.....एक बार बाल को छू लेने की ख्वाहिश थी। पर जब भी पीछे जाती, वे मुड़कर हँसते..... और इस तरह मेरी हसरत दिल में ही रह गई।
उनके साथ उनकी बहन 'शांता जोशी' थीं, जो हमारे लिए कुछ बनाने में व्यस्त थीं । मेरे लिए मीठा,नमकीन का लोभ था, सो उनके इर्द-गिर्द मंडराती मैंने न जाने कितनी छोटी-छोटी बेकार की कवितायें उन्हें सुनाईं.....कितना सुनीं,कितनी उबन हुई- पता नहीं, बस रिकॉर्ड-प्लेयर की तरह तुम्हारी नानी/दादी बजती गई ।
दीदी,भैया  ने एक जुगलबंदी बनाई थी -
'सुमित्रानंदन पन्त
जिनके खाने का न अंत', .... मैं फख्र से यह भी सुनानेवाली ही थी कि दीदी,भैया ने आँख दिखाया और मैं बड़ी मायूसी लिए चुप हो गई !
फिर पन्त जी ने अपनी कवितायें गाकर सुनाईं, माँ और दीदी ने भी सुनाया..... मैं कब पीछे रहती -सुनाया,'नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए....'
उसके बाद मैंने सौन्दर्य प्रिय कवि के समक्ष अपने जिज्ञासु प्रश्न रखे - ' नाना जी, पापा हैं तो अम्मा हैं, मामा हैं तो मामी , दादा हैं तो दादी......फिर यहाँ नानी कहाँ हैं?'प्रकृति कवि किसी शून्य में डूब गए, अम्मा, पापा सकपकाए , मैं निडर उत्तर की प्रतीक्षा में थी (बचपन में माँ,पिता की उपस्थिति में किसी से डर भी नहीं लगता न )। कुछ देर की खामोशी के बाद कवि ने कहा ,'बेटे, तुमने तो मुझे निरुत्तर कर दिया,इस प्रश्न का जवाब मेरे पास नहीं....' क्या था इन बातों का अर्थ, इससे अनजान मैं अति प्रसन्न थी कि मैंने उनको निरुत्तर कर दिया, यानि हरा दिया।
इसके बाद सुकुमार कवि ने सबका पूरा नाम पूछा - रेणु प्रभा, मंजु प्रभा , नीलम प्रभा , अजय कुमार और मिन्नी !
सबके नाम कुछ पंक्तियाँ लिखते वे रुक गए, सवाल किया - 'मिन्नी? कोई प्रभा नहीं ' - और आँखें बंदकर कुछ सोचने लगे और अचानक कहा - 'कहिये रश्मि प्रभा , क्या हाल है?' अम्मा ,पापा के चेहरे की चमक से अनजान मैंने इतराते हुए कहा -'छिः ! मुझे नहीं रखना ये नाम ,बहुत ख़राब है। एक लडकी-जिसकी नाक बहती है,उसका नाम भी रश्मि है................' पापा ने डांटा -'चुप रहो', पर कवि पन्त ने बड़ी सहजता से कहा, 'कोई बात नहीं , दूसरा नाम रख देता हूँ' - तब मेरे पापा ने कहा - 'अरे इसे क्या मालूम, इसने क्या पाया है....जब बड़ी होगी तब जानेगी और समझेगी ।'
जैसे-जैसे समय गुजरता गया , वह पल और नाम मुझे एक पहचान देते गए ।
वह डायरी अम्मा ने संभालकर रखा है , जिसमें उन्होंने सबके नाम कुछ लिखा था। मेरे नाम के आगे ये पंक्तियाँ थीं,
' अपने उर की सौरभ से
जग का आँगन भर देना'...........
कवि का यह आशीर्वाद मेरी ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा बन गया......इस नाम के साथ उन्होंने मुझे पूरी प्रकृति में व्याप्त कर दिया ।

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

पहचान क्या है ?






पहचान क्या है ?
लोगों की जुबां पर एक नाम
इतिहास के पन्नों पर दर्ज़ नाम
या चक्करघिन्नी सी चलती मां !
जो शहर शहर नहीं घूम पाती
बड़े बड़े समारोहों में नहीं दिखती
लेकिन सुबह से शाम तक
मन ही मन
दुअाओं के बोल बोलती है !
मा चिड़िया जैसी होती है
सामर्थ्य से अधिक भरती है उड़ान
चूजे भी रह जाते हैं हैरान
फिर गहराता है उनका विश्वास
मां तो जादूगर है
धरती को समतल कर सकती है
पहाड़ बना सकती है
बून्द बून्द जोड़कर नदी बना सकती है
उसकी पहचान उसके बच्चों में होती है
ज़िंदगी के हर घुमावदार रास्तों पर्
मां होठों पर् मंत्र की तरह उभर अाती है
पहचान क्या है - इस बात से परे
चाभी के गुच्छों सी मां
एक निवाले सी मां
अपनी पहचान बना ही जाती है !!!

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

मुस्कुराकर बोला दीया




एक दीये ने पूछा
दूसरे दीये से
जलते हुए बोलो कैसा लगता है ?
मुस्कुराकर बोला दीया
बिल्कुल वही जो तुम्हें लगता है !
बोले फिर दोनों
साथ साथ एक स्वर
अमावस्या को रौशन करके
ऐसा लगता है
कृष्ण पालना झुला रहे हैं
माता यशोदा और देवकी की
मीठी दुआएँ ले रहे हैं
हवाओं में लहराकर
जरा सा बलखाकर
सबकी बलाएँ ले रहे हैं  ...


रविवार, 20 अगस्त 2017

चिड़िया चिड़िया




चिड़िया चिड़िया
प्यारी सी चिड़िया
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
उड़ती चिड़िया
आसमान को छूने को
पंख पसारे उड़ती चिड़िया
....
चीं चीं करती आई चिड़िया
घोंसले से निकली चिड़िया
दाना चुगने जाती चिड़िया
दाना लेकर आएगी
जायों को खिलाएगी
फिर चीं चीं राग सुनाएगी
....
तिनके चुन चुन लाएगी
घोंसले को मजबूत बनाएगी
आँधी और तूफानों से
बच्चों को बचाएगी
माँ का फर्ज निभाएगी
....
रात जब घिर आएगी
पंखों में छुपाकर चूजों को
चिड़िया रानी सोजाएगी
प्रथम रश्मि के आते ही
ब्रह्म गान सुनाएगी
प्यारी चिड़िया
रानी चिड़िया
मीठे गीत सुनाएगी
....





रविवार, 13 अगस्त 2017

A TO Z

























A B C D E F G H I J K L M N 
O P Q R S T U V W X Y Z -  

THERE ARE 26 ALPHABETS :) 


a for apple
apple is good for health
b for bubbles
play with bubbles
c for cat
cat eats rat
d for dog
he protects our house
e for elephant 
looks like ganesha 
f for fairy 
fairy does miracles 
g for goat 
goat eats grass 
h for hen 
she lays eggs 
i for india 
india is our country
j for joy
live life with joy 
k for king 
king has power 
l for lime
lime water is good for health
m for monkey 
monkey jumps 
n for nest
bird makes nest
o for owl
he sees at night 
p for penguin
he likes cold 
q for queen
lakshmibai is a queen
r for red
rose is red 
s for sun 
comes in morning 
t for tiger 
king of jungle
u for umbrella 
protects from sun and rain
v for vase
place of flowers
w for watch 
tells us time 
x for xylophone 
is a musical instrument
y for year
a bunch of twelve months
z for zebra
zebra is an animal 

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

अ से अः अः तक




बिल्ली बोली म्याऊँ
अ से अनार
चूहा बोला चूँ चूँ
आ से आम
कुत्ता बोला भू भू
इ से इमली
बत्तख बोला क्वैक क्वैक
ई से ईख
बंदर बोला खी खी
उ से उल्लू
चिड़िया बोली चीं चीं
ऊ से ऊन
मुर्गा  बोले कुकड़ू कूं
कबूतर बोले गुटर गूं
ऋ से ऋषि
बकरी बोली में में
ए से एक
कोयल बोली कुहू कुहू
ऐ से ऐनक
सियार बोला हुआँ हुआँ
ओ से ओखली
पपीहा बोले पीहू पीहू
औ से औरत
अं से अंगूर
लोमड़ी को लगते खट्टे
शेर जंगल का राजा
करता है आराम
ज़ोर से दहाड़कर
कहता है ज़रा सामने आओ
डर के मारे पूरा जंगल
करता है अः अः अः अः  ...